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कभी गुरुकुल परपंरा के संवाहक रहे संस्कृत विद्यालयों को अब भागीरथ की है तलाश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के संस्कृत विद्यालयों पर जारी नए आदेश से जगी बदलाव की उम्मीद संवाद न्यूज एजेंसी देवरिया। भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत के संवर्धन के लिए जो शिक्षण संस्थाएं कभी गुरुकुल परंपरा का पालन करते हुए संस्कृत विषय का अध्ययन व अध्यापन कराने के लिए प्रसिद्ध थीं, वे दुर्दशा झेल रही हैं। शासन की ओर से भी इन विद्यालयों की दशा और दिशा को सुधारने के लिए कोई विशेष पहल नहीं किए जाने से अब इनमें शिक्षा लेने वालों की संख्या में भी कमी आ रही है। जो पढ़ रहे हैं, वे शिक्षकों एवं अन्य सुविधाओं के अभाव में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश संस्कृत माध्यमिक शिक्षा परिषद से जिले में 40 से अधिक संस्कृत विद्यालय संचालित हो रहे हैं। इनमें 32 एडेड हैं और शेष वित्तविहीन। इनमें कक्षा छह व सात को प्रवेशिका, कक्षा आठ को प्रथमा, नौवीं को पूर्व मध्यमा प्रथम, 10वीं को पूर्व मध्यमा द्वितीय, 11वीं को उत्तर मध्यमा प्रथम एवं 12वीं को उत्तर मध्यमा द्वितीय के नाम से संबोधित किया जाता है। वर्तमान में इन विद्यालयों में छात्र-छात्राओं की संख्या 3200 के करीब है। कई विद्यालय दो से तीन शिक्षकों के ही भरोसे चल रहे हैं। बीते दिनों जिन शिक्षकों की मानदेय पर नियुक्तियां की र्गइं, उन्हें अभी तैनाती नहीं दी गई है। कुछ एक को छोड़ दें तो अधिकतर संस्कृत विद्यालयों के भवन जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। कुछ विद्यालय ऐसे हैं जो गुरुकुल परंपरा का पालन करते हुए आज भी आवासीय व्यवस्था देते हैं। ये अपने संसाधन से छात्रावास व भोजन की व्यवस्था करते हैं। पिछले साल इन विद्यालयों की मरम्मत के संबंध में प्रस्ताव मांगा गया था, हालांकि, बाद में इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। संस्कृत विद्यालयों एवं शिक्षकों के साथ किया जाता है भेदभाव उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत परिषद के जिलाध्यक्ष एवं श्रीभागवत दास संस्कृत उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. कमलेश मिश्रा कहते हैं कि संस्कृत विद्यालयों एवं यहां के शिक्षकों के साथ लगातार भेदभाव किया जाता रहा है। पुरसाहाल नहीं होने से छात्र अपने भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। श्री बैकुंठनाथ पवहारि संस्कृत महाविद्यालय बैकुंठपुर के ज्योतिष के आचार्य विवेक कुमार उपाध्याय ने बताया कि दो साल पहले नया सिलेबस जोड़ दिया गया, लेकिन इनके शिक्षकों की तैनाती नहीं की गई। ऐसे में परंपरागत विषयों के अध्यापक इन आधुनिक विषयों को कैसे पढ़ाएंगे। इन विषयों की होती है पढ़ाई इन विद्यालयों में वेद, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्य ही प्रमुख विषय हैं। दो साल पूर्व नए पाठ्यक्रम के तहत इनमें गणित, विज्ञान, कम्प्यूटर, कर्मकांड एवं पौरहित्य भी जोड़ दिया गया। हालांकि, नए विषयों के शिक्षकों की तैनाती नहीं होने से यहां के छात्रों के लिए इन विषयों के लिए अध्ययन कर पाना मुश्किल साबित होता है। विषय विशेषज्ञ शिक्षक नहीं होने से छात्र खुद ही करते हैं अध्ययन श्री बैकुंठनाथ पवहारि संस्कृत महाविद्यालय बैकुंठपुर के उत्तर मध्यमा द्वितीय वर्ष के छात्र अतुल तिवारी एवं पूर्व मध्यमा प्रथम के छात्र करन मिश्रा ने बताया कि अन्य बोर्ड की अपेक्षा हमारे यहां खेलकूद व छात्रावासीय सुविधाएं नहीं हैं। पाठ्यक्रम बदलने से विषय के अध्यापक नहीं होने से खुद ही अध्ययन करना पड़ता है। कोट संस्कृत विद्यालयों के संबंध में जो भी सूचनाएं शासन की ओर से मांगी जाती हैं, उन्हें यहां से उपलब्ध करा दिया जाता है। छह माह पहले भी इनकी दशा सुधारने की पहल के तहत जो भी सूचना मांगी गई थी, वे दे दी गई थीं। अब विधानसभा चुनाव के बाद ही इनमें कुछ परिवर्तन या विकास के कार्य होना संभव है। -डीके गुप्ता, डीआईओएस